आज विराजेंगे भगवान श्री गणेश, हर्षोउल्लास से भरा गणेश चतुर्थी त्यौहार

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गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में गणेशोत्व की बडी़ धूमधाम रहती है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवन श्री गणेश का जन्म हुआ था। गणेश चतुर्थी पर हिंदू भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। वहीं सभी भक्त अपने-अपने घरों पर भगवान की स्थापना करते हैं, और मंदिरों को सजाते हैं| इस प्रतिमा का ग्यारा दिनों तक पूजन किया जाता है। 11 दिन बाद गानों और बाजों के साथ गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।

शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण + पति = गणपति। संस्कृतकोशानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्रक। ‘पति’ अर्थात स्वामी, ‘गणपति’ अर्थात पवित्रकों के स्वामी पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व 10 सितंबर 2021, शुक्रवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाना है| इस दिन चित्रा नक्षत्र रहेगा और ब्रह्म योग रहेगा|

कथा

शिवपुराण के अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वार पाल बना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गज मुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्य देकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्ष पर्यन्त श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

गणेश चतुर्थी का महत्व

ऐसा माना जाता है कि जो भक्त गणेश की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो, गणेश चतुर्थी का मुख्य सार यह है कि जो भक्त उनकी पूजा करते हैं, वे पापों से मुक्त हो जाते हैं और यह उन्हें ज्ञान और ज्ञान के मार्ग पर ले जाता है।

ऐतिहासिक रूप से, यह त्योहार राजा शिवाजी के समय से मनाया जाता रहा है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान था कि लोकमान्य तिलक ने गणेश चतुर्थी को एक निजी उत्सव से एक भव्य सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया, जहाँ समाज की सभी जातियों के लोग एक साथ आ सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं और एकजुट हो सकते हैं।

वर्षों से बढ़ती पर्यावरण जागरूकता के साथ, लोगों ने गणेश चतुर्थी को पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाना शुरू कर दिया है। इसमें शामिल हैं- प्राकृतिक मिट्टी/मिट्टी से गणेश की मूर्तियाँ बनवाना और पंडालों को सजाने के लिए केवल फूलों और प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करना।

विनायक चविथि के अनुष्ठान

चार मुख्य अनुष्ठान हैं जो 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान किए जाते हैं। वे हैं- प्राणप्रतिष्ठा, षोडशोपचार, उत्तरपूजा और गणपति विसर्जन।


गणेश चतुर्थी का उत्साह वास्तव में त्योहार शुरू होने से कुछ सप्ताह पहले होता है। कारीगर अलग-अलग पोज और साइज में गणेश की मिट्टी की मूर्तियां तैयार करने लगते हैं।

गणेश की मूर्तियों को घरों, मंदिरों या इलाकों में खूबसूरती से सजाए गए ‘पंडाल’ में स्थापित किया जाता है। प्रतिमा को फूलों, मालाओं और रोशनी से भी सजाया गया है। प्राणप्रतिष्ठा नामक एक अनुष्ठान मनाया जाता है जहां एक पुजारी देवता में जीवन का आह्वान करने के लिए मंत्र का जाप करता है।

फिर 16 अलग-अलग तरीकों से गणेश की मूर्ति की पूजा की जाती है। इस अनुष्ठान को षोडशोपचार कहा जाता है।

लोग धार्मिक गीत गाकर या बजाकर, ढोल की थाप पर नाचकर और आतिशबाजी करके जश्न मनाते हैं – ये सभी उत्सव के मूड को बढ़ाते हैं।

उत्तरपूजा अनुष्ठान तब किया जाता है जो गणेश को गहरे सम्मान के साथ विदाई देने के बारे में है। इसके बाद गणपति विसर्जन होता है, एक समारोह जिसमें प्रतिमा को अब पानी में विसर्जित किया जाता है। मूर्ति को समुद्र में ले जाते समय और उसे विसर्जित करते समय, लोग आम तौर पर मराठी भाषा में ‘गणपति बप्पा मोरया, पुरच्य वर्षी लौकारिया’ का जाप करते हैं, जिसका अर्थ है ‘अलविदा भगवान, कृपया अगले साल वापस आएं’।

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