गुजरात में 12वीं सदी के प्राचीन गलतेश्वर महादेव मंदिर के शिखर का पुरातत्व विभाग ने किया पुनर्निर्माण, फेहराया गया हिंदू धर्म ध्वज

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गांधीनगर| भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने हाल ही में गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित गलतेश्वर महादेव मंदिर के ऊपर 75 फीट ऊँचे शिखर का निर्माण पूरा किया। इसके बाद श्रावण के पवित्र महीने के अंतिम दिन सोमवती अमावस्या के शुभ अवसर पर शिखर पर 52 गज का हिंदू धार्मिक ध्वज फहराया गया।

हिंदू धर्म की ध्वज पताका फहराए जाने के दौरान गल्तेश्वर मंदिर के मोहनदासजी महाराज, नाडियाड संतराम मंदिर के निर्गुणदासजी महाराज, सत्यदासजी महाराज और अन्य संत मौजूद रहे थे। मंदिर की देखरेख करने वाले रामदेस महाराज ने इसके विकास पर टिप्पणी करते हुए कहा कि तीन साल पहले बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उन्होंने यह भी बताया कि गुजरात के पूर्व सीएम नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के लिए दिल्ली चले जाने के तुरंत बाद मंदिर के जीर्णोद्धार की अनुमति दी गई थी।

इस बीच केंद्र में राज्य मंत्री देवुसिंह चौहान, गुजरात बीजेपी उपाध्यक्ष गोरधन जदाफिया और नडियाद के विधायक पंकज देसाई ने 7 सितंबर को मंदिर पर एक नया पताका चढ़ाया। मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए पीएम मोदी को श्रेय दिया गया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन गलतेश्वर महादेव सोलंकी युग का मंदिर है जो सरनाल के एक छोटे से गाँव में माही और गलती नदियों के संगम (संगम) पर स्थित है। इसका निर्माण 12 वीं शताब्दी किया गया था। एएसआई के मुताबिक, इस मंदिर की शैली और मूर्तिकला प्राचीन सोमनाथ मंदिर से मिलती जुलती है। इसमें आठ बिंदु तारे के आकार के प्लिंथ पर बने असेंबली हॉल को 40 खंबे सहारा देते हैं। इसमें मालवा और चालुक्य शैली का बहुत ही खूबसूरत तरीके से मिश्रण किया गया है। मंदिर की दीवारों को विभिन्न देवताओं, गंधर्वों, मनुष्यों, ऋषियों, घुड़सवारों, हाथी सवारों, रथों और मानव जीवन की विभिन्न घटनाओं को उकेरा गया है।

प्राचीन लोककथाओं के मुताबिक, ऐसी मान्यता है कि शिवलिंग महान ऋषि गलवी मुनि द्वारा गहन तपस्या के बाद उभरा था। उन्होंने पवित्र गंगा नदी से शिवलिंग पर बहने का आग्रह किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा गल्ती नदी के रूप में उतरी, शिवलिंग को स्नान कराया और फिर माही नदी में मिल गईं। स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि गल्तेश्वर महादेव मंदिर के नीचे आज भी गंगा बहती हैं। मंदिर को एएसआई द्वारा संरक्षित किया गया है और यह राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के अंतर्गत आता है, लेकिन अज्ञात समय से बिना शिखर के था।

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