छत्तीसगढ़ का मुख्य त्यौहार “पोला”

CHATTISGARH RELIGIOUS

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसमें मवेशियों का भी महतवपूर्ण योगदान है| भारत देश में इन मवेशियों की पूजा की जाती है, पोला भी उन्ही में से एक है| पोला त्यौहार के दिन कृषि गाय और बैलों की पूजा की जाती है| छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में पोला लेकर धूम रहती है| किसान और अन्य लोग पोला के दिन अपनी खेतों पर काम करने वालें गायों और बैलों को साफ कर के उन्हें सजाते है, और पशुओं की विशेष रूप से बैलों की पूजा करते है| पोला त्यौहार में बच्चे मिट्टी के बैल चलाते हैं। इस दिन बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। और इस दिन में बैलो से कोई काम भी नहीं कराया जाता है। और घरों में महिलाएं व्यंजन बनाती हैं। पोला को बैला पोला के नाम से भी जाना जाता है|

पोला त्योहार भादो माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है जिसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। यह अगस्त सितंबर के महीने में आता है, साल 2021 में यह 6 सितंबर को पड़ रहा है| पोला-पिठोरा मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है। इसके साथ ही इस दिन ‘बैल दौड़ प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जाता है। पोला पर्व पर शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना की होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुला कर सजाते हैं, फिर हर घर में उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद घरों में बने पकवान भी बैलों को खिलाए जाते हैं। इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है। पर्व के दो-तीन दिन पूर्व से ही बाजारों में लकड़ी तथा मिट्टी के बैल जोड़ियों में बिकते दिखाई देते हैं।

पोला त्यौहार का नाम पोला क्यों पड़ा

विष्णु भगवान जब कृष्ण जी के रूप में धरती में आए थे, तब जन्म से ही उनके कंस मामा उनकी जान के दुश्मन बने हुए थे। कृष्ण भगवान जब छोटे थे और वासुदेव-यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था। एक बार कंस ने पोलासुर नामक असुर को भेजा था, इसे भी कृष्ण ने अपनी लीला के चलते मार दिया था, और सबको अचंभित कर दिया था। वह दिन भादों माह की अमावस्या का दिन था, इस दिन से इसे पोला कहा जाने लगा।

क्या है पोला त्यौहार का महत्व

भारत, जहां कृषि आय का मुख्य स्रोत है और ज्यादातर किसानों की खेती के लिए बैलों का प्रयोग किया जाता है. इसलिए किसान पशुओं की पूजा आराधना एवं उनको धन्यवाद देने के लिए इस त्योहार को मनाते है. बड़ा पोला में बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है वहीं, छोटा पोला में बच्चे खिलोने के बैल या घोड़े को पड़ोस में घूमने ले जाते है| और फिर उन्हें कुछ पैसे या उपहार मिलते हैं|

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ बहुत सी आदिवासी जाति एवं जनजाति रहती है. यहाँ के गाँव में पोला के त्यौहार को बड़ी धूमधाम से मनाते है| यहाँ सही के बैल की जगह लकड़ी एवं लोहे के बैल की पूजा की जाती है, बैल के अलावा यहाँ लकड़ी, पीतल के घोड़े की भी पूजा की जाती है|

इस दिन घोड़े, बैल के साथ साथ चक्की (हाथ से चलाने वाली चक्की) की भी पूजा की जाती है| पहले के ज़माने में घोड़े बैल, जीवनी को चलाने के लिए मुख्य होते थे, एवं चक्की के द्वारा ही घर पर गेहूं पीसा जाता था| तरह तरह के पकवान इनको चढ़ाये जाते है, सेव, गुझिया, मीठे खुरमे आदि बनांये जाते है| घोड़े के उपर थैली रखकर उसमें ये पकवान रखे जाते है| फिर अगले दिन सुबह से ये घोड़े, बैल को लेकर बच्चे मोहल्ले पड़ोस में घर – घर जाते है, और सबसे उपहार के तौर पर पैसे लेते है| इसके अलावा पोला के दिन मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में गेड़ी का जुलुस निकाला जाता है. गेड़ी, बांस से बनाया जाता है, जिसमें एक लम्बा बांस में नीचे 1-2 फीट उपर आड़ा करके छोटा बांस लगाया जाता है| फिर इस पर बैलेंस करके, खड़े होकर चला जाता है| गेड़ी कई साइज़ की बनती है, जिसमें बच्चे, बड़े सभी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है| ये एक तरह का खेल है, जो मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ का पारंपरिक खेल है, भारत के अन्य क्षेत्रों में तो इसे जानते भी नहीं होंगें| पोला का त्यौहार हर इंसान को जानवरों का सम्मान करना सिखाता है| जैसे जैसे ये त्यौहार आने लगता है, सभी लोग मेहनती किसों को हैप्पी पोला कहकर मुबारकबाद देने लगते है|

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