कोयला संकट: पवार प्लांट्स ने कम किया कोयले का स्टॉक, देसी कोयले की मांग 18 %तक बढ़ी, कोल इंडिया 5 से 10% बढ़ी मांग ही पूरी कर पा रहा

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नई दिल्ली| देश के 137 में से 72 पावर प्लांट्स के पास 3 दिन का कोयला… 50 पावर प्लांट्स के पास 4 से 10 दिन का कोयला…! ये आंकड़े बताते हैं कि पावर प्लांट्स के पास पर्याप्त कोयला नहीं है। अब सवाल यह है कि ऐसी स्थिति बनी क्यों? देश जिस कोल इंडिया पर कोयले के लिए निर्भर है, क्या वह पर्याप्त आपूर्ति करने में विफल रहा? भास्कर पड़ताल में पता चला है कि अब भी कोल इंडिया के पास 400 लाख टन कोयले का स्टॉक है। इससे वह 24 दिन तक आपूर्ति कर सकता है।

दरअसल, विदेश में कोयला महंगा होते ही पावर प्लांट्स ने इसका आयात बंद कर दिया। वे पूरी तरह कोल इंडिया पर निर्भर हो गए। पड़ताल में यह भी पता चला कि कोयले की कमी से निपटने की तैयारी प्लांट्स के पास भी नहीं थी। प्लांट्स ने स्टॉक क्षमता कम कर दी थी। जैसे ही आपूर्ति घटी, बिजली यूनिट बंद होने लगीं। मतलब साफ है कि आयात बंद होने से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए न कोल इंडिया तैयार था और न ही पावर प्लांट…।

इधर, दिल्ली में कोयला मंत्रालय ने रविवार को बताया कि प्लांट्स को आपूर्ति के लिए कोयले का पर्याप्त स्टॉक है। प्लांट्स के पास अभी 72 लाख टन कोयला है, जो 4 दिन के लिए पर्याप्त है। कोल इंडिया के पास भी 400 लाख टन से अधिक कोयला है। इसकी पावर प्लांट्स को आपूर्ति की जाना है। वहीं बिजली मंत्रालय ने रविवार को बताया कि बिजली की खपत शनिवार को 7.2 करोड़ यूनिट (2%) घटकर 382.8 करोड़ यूनिट रह गई, जो शुक्रवार को 390 करोड़ यूनिट थी। इसके चलते कोयले की कमी के बीच देशभर में बिजली की आपूर्ति में सुधार हुआ है।

एक्सपर्ट की क्या है राय


BCCL में टेक्निकल ऑपरेशन के पूर्व निदेशक राकेश कुमार और कोल इंडिया में मार्केटिंग के पूर्व डायरेक्टर एसएन प्रसाद से इस बारे में बात की गई। उन्होंने बिजली का संकट गहराने के 4 कारण बताए।

  1. उद्योग खुलने से मांग बढ़ी: कोरोनाकाल में उद्योग बंद थे। अनलॉक के बाद उद्योग खुलते गए, बिजली की मांग बढ़ती गई। पावर प्लांट्स से आज 18% अधिक कोयले की मांग है, जबकि कोल इंडिया 5-10% बढ़ी मांग ही पूरी कर सकता है।
  2. ज्यादा बारिश, पानी भरा: 14 सितंबर तक मानसून विदा हो जाता है। इस बार बाद तक बारिश होती रही। आज भी कई ओपनकास्ट (खुली खदानें) में पानी भरा है। साइडिंग तक पहुंच मार्ग खराब हैं। स्टॉक होते हुए कोयले डिस्पैच नहीं हो सका।
  3. निर्भरता बढ़ी : चीन, ऑस्ट्रेलिया की बजाय इंडोनेशिया से कोयला लेने लगा। कोयला महंगा हुआ। बड़े पावर प्लांट्स ने विदेश से कोयला मंगाना बंद कर दिया। अब सबको कोल इंडिया से कोयला चाहिए।
  4. प्लांट्स ने घटाया स्टॉक: कोरोनाकाल में कोयले की ढुलाई तेजी से हुई। पावर प्लांट कोयला मांगते, 24 घंटे में पहुंच जाता। ऐसे में प्लांट 7-10 दिन का स्टॉक रखने लगे। नियमानुसार 22 से 25 दिन का होना चाहिए। अब मांग बढ़ी तो तुरंत कोयला नहीं मिला।

आगे क्या करना होगा:

  • उत्पादन बढ़े, जो कोयला है उसे भेजें : मानसून व अन्य कारणों से कोयले का उत्पादन बाधित हुआ। यह अपने हाथ में नहीं। पर डिस्पैच अपने हाथ में है। जो स्टॉक है, वह अधिक से अधिक प्लांट तक पहुंचे।
  • मानसून विदा, अब उत्पादन बढ़ाएं : टॉप टु बॉटम इस दिशा में काम करें। प्लान बनाकर उत्पादन में जुटें, जैसा सरकार कह भी रही है।
  • नीतिगत फैसला रुकावट नहीं बने: कई प्रोजेक्टों में उत्पादन बंद है। मेगा माइंस के पास उत्पादन के लिए पांच साल की जमीन उपलब्ध होनी चाहिए। कई माइंस जमीन विवाद में बंद पड़ी हैं। ये चालू हों।
  • कोल इंडिया उत्पादन लक्ष्य से 267.5 लाख टन पीछे
  • आंकड़े बताते हैं कि दो साल में कोल इंडिया का कोयला उत्पादन 106.7 लाख टन गिरा है। सितंबर 2021-22 तक कंपनी ने 2600.7 लाख टन उत्पादन किया, जबकि लक्ष्य 2874.2 लाख टन था। यानी वर्तमान में भी कोल इंडिया अपने लक्ष्य से 267.5 लाख टन पीछे है।

UP के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र


UP में कोयले की कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने PM नरेंद्र मोदी से कोयला की अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए पत्र लिखा है। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि कोयले की कमी के कारण यह संकट गहरा सकता है।

यूरोप में बिजली 250%, गैस 400% महंगी हुई; दुनिया के कई देशों में हालात बिगड़ रहे


दुनिया भर में ऊर्जा का संकट गहरा गया है। अंधेरे में डूबने के हालत पैदा हो रहे हैं। कुछ देशों में बिजली कट हो चुकी है तो कई देशों में कोयले की किल्लत के कारण बिजली कट होने वाली है। कोयला नहीं है, नेचुरल गैस और तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। यूरोप में इस वर्ष की शुरुआत से अब तक नेचुरल गैस के दाम 400%, जबकि बिजली के 250% बढ़ चुके हैं।

चीन की फैक्ट्रियों में 18 फीसदी तक उत्पादन कम हो चुका है। बड़ा सवाल है कि दुनिया को आखिर ऊर्जा का संकट क्यों झेलना पड़ रहा है, ये कब तक रहने वाला है? विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोना काल के बाद सामान्य हालात लौटने पर उत्पादन क्षेत्र में अचानक बढ़ी मांग इसका बड़ा कारण है। अब आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में पूरी दुनिया में बिजली का संकट गहरा सकता है।

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