रायपुर| छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग ने रविवार को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर एक संगोष्ठी आयोजित की। मुख्य वक्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सौरभ वाजपेयी ने कहा, इमरजेंसी नहीं लगती तो बांग्लादेश के शेख मुजीबुर्रहमान की तरह पूरे गांधी परिवार की हत्या हो जाती। यह बात इंदिरा गांधी जानती थीं।

साइंस कॉलेज के दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में हुई संगोष्ठी में प्रो. वाजपेयी ने कहा, इस देश ने अंग्रेजों को तो देश के बाहर कर दिया, लेकिन इस देश को भीतर से कमजोर करने वाली एक ताकत छुपकर अपनी ताकत बढ़ा रही थी। वह साम्प्रदायिक ताकत थी। इंदिरा जी को इस बात का एहसास था कि अगर साम्प्रदायिकता के खतरे से देश को महफूज नहीं रखा तो यह देश अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रहेगा। इंदिरा गांधी को पता था कि साम्प्रदायिक ताकतों को बढ़ने नहीं देना है। इसी को देखते हुए 1975 में इंदिरा जी ने वह किया। आज जो हो रहा है, उसको इंदिरा जी ने कम से कम 45 साल के लिए टाल दिया। सौरभ वाजपेयी ने विनोबा भावे की शिष्या रहीं निर्मला देशपांडे के हवाले से कहा, ऐसे पर्चे विनोबा जी के पास पहुंचे जिसमें साफ-साफ लिखा था कि जो बांग्लादेश में हुआ वही हिंदुस्तान में होना चाहिए।

प्रो. वाजपेयी ने कहा, 15 अगस्त 1975 को इस उपमहाद्वीप के बहुत बड़े नेता शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार सहित क्रूर हत्या कर दी गई। यह हत्या आईएसआई की मदद की इस्लामिक कट्‌टरपंथियों ने किया था। पूरे देश में ऐसे पर्चे बांटे जा रहे थे। आप बताइए यह कौन से लोकतंत्र की लड़ाई चल रही थी इस देश के भीतर जिसमें प्रधानमंत्री और उसके पूरे परिवार की हत्या करने के लिए पर्चे बांटे जा रहे थे। ऐसे पर्चों पर बांटने वाले लोगों और संगठनों के नाम नहीं लिखे होते। यह कॉमनसेंस होता है जिससे आप तय करते हैं कि यह कौन लिख रहा होगा। प्रो. वाजपेयी ने कहा, 15 अगस्त को ध्वजारोहण के लिए जाते समय इंदिरा गांधी ने अपने सचिव पीएल हक्सर से कहा, सुनो यही हिंदुस्तान में होता अगर इमरजेंसी नहीं लगती। प्रो. वाजपेयी ने कहा, यह बात इंदिरा जी को पता था। वह साम्प्रदायिकता और फिरकापरस्ती से लड़ रही थीं जो किसी भी तरह इस देश की राजसत्ता पर काबिज होना चाहता था।

वह धर्मनिरपेक्षता की कीमत समझती थीं

प्रो. सौरभ वाजपेयी ने कहा, इंदिरा गांधी धर्मनिरपेक्षता की कीमत समझती थीं। वह जानती थीं कि इस भूखंड जिसमें भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश हैं में धर्मनिरपेक्षता जिंदा नहीं रहेगी तो शायद हमारा भविष्य भी अंधकार में है।

भक्तचरण ने इंदिरा के संघर्ष पर जोर दिया

पूर्व केंद्रीय मंत्री और AICC के छत्तीसगढ़ प्रभारी रहे भक्तचरण दास ने कहा, इंदिरा गांधी को हमे उनकी राजनीति से समझना होगा। वे बचपन से ही नेहरु जी के साथ आजादी के आंदोलन में थीं। बच्चों के दो संगठन बनाए थे। 1950 में वे सक्रिय राजनीति में आईं। 1956 में वे यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1958 में पार्लियामेंट्री बोर्ड में आईं। 1964 में पहली बार राज्यसभा में आईं और 1966 में प्रधानमंत्री बनीं। आज जब लोग जल्दी ही बड़े पद पर पहुंचना चाहते हैं, उन्होंने धैर्य के साथ अपनी जिम्मेदारी संभाली।

चौबे बोले, आत्मनिर्भरता का सारा श्रेय इंदिरा जी को

कृषि एवं जल संसाधन मंत्री रविंद्र चौबे ने कहा, देश अगर आत्मनिर्भर है तो उसका सारा श्रेय इंदिरा गांधी को जाता है। आज अगर देश के गरीबाें को अपने पैरों पर खड़ा होने का स्वावलंबी होने का अवसर मिला है, उसका भी श्रेय इंदिरा जी को जाता है। इंदिरा जी ने प्रिवीपर्स खत्म कर राजा महाराजाओं को आम इंसान के बगल में खड़ा कर दिया।

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