रायपुर की खारुन नदी के तट पर आयोजित पुन्नी मेले में CM भूपेश बघेल पहुंचे। यहां उन्होंने नदी में डुबकी लगाई। नदी में स्नान के दौरान मुख्यमंत्री पानी में कलाबाजी करते हुए उछल कर पलट गए। देखने वाले भी मुख्यमंत्री का ये अंदाज देखकर हैरान थे। बीते तीन सालों से इसी तरह मुख्यमंत्री यहां पहुंचते हैं। इसके बाद सभी ऐतिहासिक हटकेश्वर महादेव मंदिर में पहुंचे। यहां CM ने महादेव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की और प्रदेश वासियों की सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना की।

मीडिया से बात करते हुए CM ने कहा कि कार्तिक महीने में सूर्योदय से पहले स्नान करने का अपना महत्व है। हम यहां दीप दान करते हैं, भगवान महादेव की आराधना करते हैं। हमारे छत्तीसगढ़ का यह पहला मेला है। मैं जब से यहां आने लगा ये मेला लोगों की नजरों में और आया। अच्छा है अपनी संस्कृति से जुड़ना चाहिए। मैं बचपन में भी इसी तरह गांव के तालाब में स्नान किया करता था।

मीडिया से बात करते हुए CM ने कहा कि कार्तिक महीने में सूर्योदय से पहले स्नान करने का अपना महत्व है। हम यहां दीप दान करते हैं, भगवान महादेव की आराधना करते हैं। हमारे छत्तीसगढ़ का यह पहला मेला है। मैं जब से यहां आने लगा ये मेला लोगों की नजरों में और आया। अच्छा है अपनी संस्कृति से जुड़ना चाहिए। मैं बचपन में भी इसी तरह गांव के तालाब में स्नान किया करता था।

600 साल पुराने मेले का दिलचस्प इतिहास

खारुन नदी पर इस मेले की शुरुआत 600 साल पहले हुई। हटकेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी पं.सुरेश गिरी गोस्वामी बताते हैं कि एक किंवदन्ती के अनुसार सन्‌ 1428 के आसपास पुन्नी मेला की शुरुआत हुई थी। राजा ब्रह्म देव की कोई संतान नहीं थीं, राजा ने खारुन नदी के किनारे स्थित हटकेश्वरनाथ महादेव से संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी। जब राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई तो राजा ने आसपास के अनेक गांवों के लोगों को आमंत्रित कर भोज का आयोजन किया।

हजारों की संख्या में ग्रामीण खारुन नदी के किनारे जुटे, जिनके लिए राजा ने ठहरने, भोजन करने और उनके मनोरंजन के लिए झूले, खेल-तमाशों का आयोजन किया। उस दिन कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि होने और नदी में पुण्य स्नान करने की मान्यता के चलते हजारों ग्रामीणों ने डुबकी लगाई। इसके बाद हर साल मेला आयोजन करने की परंपरा चल पड़ी।

ऐसी भी मान्यता है कि छत्तीसगढ़ से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजस्थान स्थित पुष्कर तीर्थ में कार्तिक मेला लगता था। कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान और पूजा में शामिल होने के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंचते थे। वहां तक जाने के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों को कई दिन लग जाते थे। इसे देखते हुए राजा ब्रह्म देव ने खारुन नदी के किनारे हटकेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करने का निर्णय लिया।

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