हर साल आश्विन पूर्णिमा के दिन वाल्‍मीकि जयंती मनाई जाती है. इस दिन मंदिरों ने महर्षि वाल्‍मीकि की विशेष पूजा की जाती है और जगत के कल्याण की कामना की जाती है. इस साल वाल्मीकि जयंती 20 अक्टूबर यानी आज मनाई जा रही हैं| बता दें कि महर्षि को संस्कृत का आदिकवि कहा जाता है| पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी. संस्कृत भाषा में रचित इस महाकाव्य में 24000 श्लोक हैं. जानकारी के अनुसार इसे वाल्‍मीकि रामायण भी कहा जाता है. इस वर्ष वाल्मीकि जयंती 20 अक्टूबर यानी आज मनाई जा रही है. जानिए, पूर्णिमा तिथि के लिए पूजा का शुभ मुहूर्त और वाल्मीकि जी से जुड़ी पौराणिक कथाएं

संस्कृत का पहला श्लोक

महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी एक और घटना है जिसका वर्णन अत्यंत आवश्यक है. एक बार महर्षि वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे. वह जोड़ा प्रेम करने में लीन था. पक्षियों को देखकर महर्षि वाल्मीकि न केवल अत्यंत प्रसन्न हुए, बल्कि सृष्टि की इस अनुपम कृति की प्रशंसा भी की. इतने में एक पक्षी को एक बाण आ लगा, जिससे उसकी जीवन -लीला तुरंत समाप्त हो गई. यह देख मुनि अत्यंत क्रोधित हुए और शिकारी को संस्कृत में कुछ श्लोक कहा. मुनि द्वारा बोला गया यह श्लोक ही संस्कृत भाषा का पहला श्लोक माना जाता है.

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥‘

वाल्मीकि जयंती 2021 तिथि

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ति​​थि का प्रारंभ 19 अक्टूबर दिन मंगलवार को शाम 07 बजकर 03 मिनट पर हुआ है. इस तिथि का समापन 20 अक्टूबर दिन बुधवार को रात 08 बजकर 26 मिनट पर होगा.

महर्षि वाल्मीकि जी की पौराणिक कथाएं

– महर्षि वाल्‍मीकि का बचपन कैसे बीता?

कहा जाता है कि महर्षि वाल्मीकि का असल नाम रत्नाकर था. उनके पिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे लेकिन रत्नाकर जब बहुत छोटे थे तब एक भीलनी ने उन्हें चुरा लिया था. जिसके बाद वह भीलों के समाज में पले-बढ़ें. वहां कई सारे भील राहगीरों को लूटने का काम करते थे. इसलिए वाल्मीकि ने भी वही रास्ता अपनाया.

– डाकू से महर्षि वाल्मीकि बनने का सफर

एक बार नारद मुनि जंगल के रास्ते जाते हुए डाकू रत्नाकर के चंगुल में आ गए. बंदी नारद मुनि ने रत्नाकर से सवाल किया कि क्या तुम्हारे घरवाले भी तुम्हारे बुरे कार्यों में तुम्हारा साथ देंगे? रत्नाकर ने अपने घरवालों के पास जाकर नारद मुनि का सवाल दोहराया. जिसके जवाब में उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया. डाकू रत्नाकर को इस बात से काफी झटका लगा और उसका ह्रदय परिवर्तन हो गया. साथ ही उसमें अपने जैविक पिता के संस्कार जाग गए. इसके बाद रत्नाकर ने नारद मुनि से मुक्ति का रास्ता पूछा.

– राम नाम का जाप

नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का जाप करने की सलाह दी लेकिन रत्नाकर के मुंह से राम की जगह मरा-मरा निकल रहा था. इसकी वजह उनके पूर्व कर्म थे. नारद ने उन्हें यही दोहराते रहने को कहा और कहा कि तुम्हें इसी में राम मिल जाएंगे. ‘मरा-मरा’ का जाप करते-करते कब रत्नाकर डाकू तपस्या में लीन हो गया. तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें ‘वाल्मीकि’ नाम दिया और साथ ही रामायण की रचना करने को कहा.

महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में कई किंवदंतियां हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म महर्षि कश्यप और देवी अदिति के 9वें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चारशिनी से हुआ था। इस क्षेत्र में पहला श्लोक लिखने का श्रेय महर्षि वाल्मीकि को भी जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, प्रचेता नाम के एक ब्राह्मण के पुत्र, उनका जन्म रत्नाकर के रूप में हुआ था, जो कभी डकैत थे। नारद मुनि से मिलने से पहले उन्होंने कई निर्दोष लोगों को मार डाला और लूट लिया, जिन्होंने उन्हें एक अच्छे इंसान और भगवान राम के भक्त में बदल दिया। वर्षों के ध्यान अभ्यास के बाद वह इतना शांत हो गया कि चींटियों ने उसके चारों ओर टीले बना लिए। नतीजतन, उन्हें वाल्मीकि की उपाधि दी गई, जिसका अनुवाद “एक चींटी के टीले से पैदा हुआ” है।

– रामायण की रचना की कहानी

महर्षि वाल्मीकि ने नदी के तट पर क्रोंच पक्षियों के जोड़े को प्रेमालाप करते हुए देखा लेकिन तभी अचानक पास में मौजूद एक शिकारी का तीर नर पक्षी को लग गया. ये देखकर कुपित हुए वाल्मीकि के मुंह से निकला, ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः .यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्.’ अर्थात प्रेम क्रीड़ा में लिप्त क्रोंच पक्षी की हत्या करने वाले शिकारी को कभी सुकून नहीं मिलेगा. हालांकि, बाद में उन्हें अपने इस श्राप के कारण दुख हुआ. तब नारद मुनि ने उन्हें सलाह दी कि आप इसी श्लोक से रामायण की रचना करने की शुरुआत करें

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