विश्वकर्मा जयंती 2021: सतयुग में स्वर्गलोक तो त्रेता युग में लंका का किया निर्माण, छत्तीसगढ़ से कभी बैलगाड़ी के चक्के जाया करते थे देशभर में

RELIGIOUS

अभियान्त्रिकी और कला के भगवान विश्वकर्मा की जयंती के अवसर पर आज पुरे देश में विश्वकर्मा पूजा की जाएगी। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को विश्वकर्मा पूजा का त्योहार मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन ही ऋषि विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। इस साल विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2021 को की जाएगी। आज के दिन इंजीनियरिंग संस्थानों व फैक्ट्रियों, कल-कारखानों व औजारों की पूजा की जाती है।

विश्वकर्मा जयन्ती भारत के कर्नाटक, असम, पश्चिमी बंगाल, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा और त्रिपुरा आदि प्रदेशों में यह आम तौर पर हर साल 17 सितंबर की ग्रेगोरियन तिथि को मनायी जाती है। यह उत्सव प्रायः कारखानों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में (प्रायः शॉप फ्लोर पर) मनाया जाता है। विश्वकर्मा को विश्व का निर्माता तथा देवताओं का वास्तुकार माना गया है। यह हिंदू कैलेंडर की ‘कन्या संक्रांति’ पर पड़ता है।

विश्वकर्मा भगवान ने स्वर्गलोक से लेकर लंका और पुष्पक वाहन से लेकर सुदर्शन चक्र का किया था निर्माण

हिन्दू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को पूजा जाता है, दिव्य वास्तुकार के लिए उत्सव का दिन है। उन्हें स्वायंभु और विश्व का निर्माता माना जाता है। उन्होंने द्वारका के पवित्र शहर का निर्माण किया जहां कृष्ण ने शासन किया, पांडवों की माया सभा, और देवताओं के लिए कई शानदार हथियारों के निर्माता थे। सृजन के देवता भगवान विश्वकर्मा वास्तुदेव एवं अंगिरसी के पुत्र हैं। उन्होंने सतयुग में स्वर्गलोक का निर्माण किया तो त्रेता युग में लंका का, द्वापर में द्वारका और कलियुग के आरंभ से पूर्व हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया। माना जाता है कि द्वारका नगरी को भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में ही बना दिया था। पुरी में जगन्नाथ मंदिर में स्थित विशाल मूर्तियों का निर्माण भी उन्होंने किया। प्राचीन काल में जितनी भी राजधानियां थीं, सभी भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाईं। भगवान विश्वकर्मा ने ही देवी-देवताओं के सारे शस्त्र बनाए। मां दुर्गा के शस्त्रों का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया। पुष्पक विमान भी उनके द्वारा बनाया गया। भगवान इंद्र के वज्र के साथ भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र का निर्माण भी उन्होंने किया।

उन्हें लुहार कहा जाता है, ऋग्वेद में उल्लेख किया गया है, और इसे यांत्रिकी और वास्तुकला के विज्ञान, स्टैप्टा वेद के साथ श्रेय दिया जाता है। विश्वकर्मा की विशेष प्रतिमाएँ और चित्र सामान्यतः प्रत्येक कार्यस्थल और कारखाने में स्थापित किए जाते हैं।सभी कार्यकर्ता एक आम जगह पर इकट्ठा होते हैं और पूजा करते हैं। विश्वकर्मा पूजा के तीसरे दिन हर्षोल्लास के साथ सभी लोग विश्वकर्मा जी की प्रतिमा विसर्जित करते हैं।

विश्वकर्मा पूजा की कथा और महत्व

मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा को सौंपी थी। ब्रह्मा जी को अपने वंशज और भगवान विश्वकर्मा की कला पर पूर्ण विश्वास था। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया तो वह एक विशालकाय अंडे के आकार की थी। उस अंडे से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। कहते हैं कि बाद में ब्रह्माजी ने इसे शेषनाग की जीभ पर रख दिया। शेषनाग के हिलने से सृष्टि को नुकसान होता था। इस बात से परेशान होकर ब्रह्माजी ने भगवान विश्वकर्मा से इसका उपाय पूछा। भगवान विश्वकर्मा ने मेरू पर्वत को जल में रखवा कर सृष्टि को स्थिर कर दिया। भगवान विश्वकर्मा की निर्माण क्षमता और शिल्पकला से ब्रह्माजी बेहद प्रभावित हुए। तभी से भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार मनाते हैं। भगवान विश्वकर्मा की छोटी-छोटी दुकानों में भी पूजा की जाती है।

रायपुर के बढ़ईपारा से कभी देशभर में जाते थे बैलगाड़ी के चक्के, परंतु आज सब बंद

राजधानी रायपुर के बढ़ईपारा का इतिहास पुराना है। यह इलाका आज पुरे देश में पहचाना जाता है| वजह यह है कि नाम से बढ़ईपारा यानी काष्ठकारों की बस्ती। इसने आधुनिकता के रंग में भी अपनी अलग पहचान स्थापित की है। हालांकि इसकी पहचान एक खास वजह मिली है। वे हैं बैलगाड़ी के चक्के समेत हल, बेलन यू कहें कि खेतीबाड़ी में जितने औजार काम आते हैं, वे सभी इसी बस्ती में बढ़ई लोगों द्वारा बनाए जाते हैं। इसके बाद इनकी मांग देश भर में होती थी। अब आधुनिक युग में खेतीबाड़ी के लिए ट्रैक्टर समेत अन्य मशीनों के आ जाने के कारण यहां गिनती के भी बैलगाड़ी के चक्के भी नहीं बन रहे हैं। विश्वकर्मा समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि हमारी पहचान कृषि औजारों के लिए होती थी, लेकिन आधुनिक युग में यह सब बंद हो चुका है। यहां के बने लकड़ी के चक्के, बेलन, हल की पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में मांग होती थी।

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