नई दिल्‍ली| 1948 के पोलो-हैदराबाद ऑपरेशन के दौरान 5 गोरखा राइफल्‍स की पहली बटालियन को कारगिल रोड और खारल ब्रिज के सामने स्थि‍त पहाडि़यों मौजूद पाकिस्‍तानी दुश्‍मनों को नेस्तनाबूद करने की जिम्‍मेदारी मिली थी. इस ऑपरेशन के लिए रवाना होने वाले भारतीय जाबांजों में जमादार लाल बहादुर पुन भी शामिल थे. 23 नवंबर 1948 को जमादार लाल बहादुर पुन अपने 15 साथियों के साथ उस जगह तक पहुंचने में कामयाब रहे, जहां से दुश्‍मन की पोजीशन बिल्‍कुल साफ थी.

जमादार लाल बहादुर पुन अपने साथियों के साथ वहीं रुक गए. अब इंतजार कंपनी के उन साथियों का, जो नदी पार कर उनके पास पहुंचने वाले थे. जमादार लाल बहादुर पुन को लगा कि नदी पार करके कंपनी के अन्‍य साथियों को उन तक पहुंचने में अधिक समय लगेगा. इस बीच, कहीं ऐसा न हो कि हमले का बेहतरीन अवसर उनके हाथों से निकल जाए. इसी सोच के साथ जमादार लाल बहादुर पुन ने अपने साथियों का इंतजार करने की बजाय हमले का फैसला किया. दूसरी तरफ, दुश्‍मन की संख्‍या और क्षमता आठ गुना से भी अधिक थी.

बिना नुकसान मार गिराए 10 पाकिस्‍तानी दुश्‍मन

दुश्‍मन की संख्‍या और क्षमता की परवाह किए बगैर जमादार लाल बहादुर पुन ने अपने साथियों को हमले के लिए तैयार किया. बेहद सटीक युद्धक रणनीति के साथ उन्‍होंने अपने साथियों को पहाड़ी पर चढ़ाया और दूसरी तरफ से खुद मोर्चा संभाल कर हमले के लिए तैयार हो गए. सही समय पर दोनों तरफ से एक साथ दुश्‍मन पर हमला किया गया. इस हमले ने पाकिस्‍तानी दुश्‍मन भौचक्‍का रह गया. इस ऑपरेशन में भारतीय सेना के जांबाजों ने 10 दुश्‍मन मार गिराए. बाकी बचे दुश्‍मनों ने युद्ध भूमि से भागने में ही अपनी बेहतरी समझी.

वीर चक्र से सम्‍मानित हुए जमादार लाल बहादुर

इस ऑपरेशन में भारतीय सेना का एक भी जांबाज हताहत नहीं हुआ था. 5 गोरखा राइफल्‍स की पहली बटालियन के जमादार लाल बहादुर पुन की इस शानदार पहल और साहसी नेतृत्व को देखते हुए उन्‍हें वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया. यह सम्‍मान उन्‍हें 21 जून 1950 को प्रदान किया गया था.

Leave a Reply