भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के बाद अब इंदौर के भंवरकुआं चौराहे और पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम भी बदल दिया गया है| भंवरकुआं चौराहा जननायक टंटया मामा भील चौराहा कहलाएगा| मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंडला में इसका ऐलान किया| इसके अलावा इंदौर में 53 करोड़ की लागत से बन रहे नये बस स्टैंड और पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम टंट्या मामा के नाम पर रखा जाएगा|

सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ऐलान किया कि इंदौर के नये बस स्टैंड को टंटया मामा भील बस स्टैंड के नाम से जाना जाएगा| मंडला में मेडिकल कॉलेज खोला जाएगा और इसका नाम राजा हृदयशाह के नाम पर रखा जाएगा|

हाल ही में भोपाल में देश के पहले वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन हबीबगंज का नाम बदलकर रानी कमलापति किया गया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी महीने 15 नवंबर को रेनोवेट किये गए इस स्टेशन का लोकार्पण किया है. रानी कमलापति भोपाल की आखिरी गौंड रानी थीं. आदिवासी जननायक शहीद बिरसा मुंडा की जयंती पर हबीबगंज स्टेशन का नाम बदला गया था. इसे आगामी पंचायत, नगरीय निकाय और फिर विधानसभा चुनाव के लिए आदिवासी समाज को खुश करने की कोशिश के तौर पर देखा गया

टंट्या भील [ इंडियन रोबिंहुड ] का नाम सबसे बड़े व्यक्ति के रुप मे लिया जाता है वे बड़े योद्दा थे । आज भी बहुत आदिवासी घरो मे टंट्या भील कि पुजा कि जाती है,कहा जाता है कि टंट्या भील को सभी जानवरो कि भाषा आती थी, टंट्या भील के आदिवासीयों ने देवता कि तरह माना था, आदिवासी जन आज भी कहते है,कि टंट्या भील को अलओकिक शक्ति प्राप्त थी, इन्ही शक्तियों के सहारे टंट्या भील एक ही समय 1700 गाँवो मे ग्राम सभा लिया करते थे,इन्ही शक्तियो के कारण अंग्रेजों के 2000 सैनिको के द्वारा भी टंट्या भील को कोई पकड़ नही पाता था । टंट्या भील देखते ही देखते अंग्रेजों के आँखो के साम्नने से ओझल हो जाते थे। कहा जाता है, कि टंट्या भील लाखो आदिवासी झगड़ो को ग्रामसभा मे ही हल किया कर देते थे,टंट्या भील , इनके पिता जी का नाम भाऊ सिंह भील था ।

में जाँबाजी का अमिट अध्याय बन चुके आदि विद्रोही टंट्या भील अंग्रेजी दमन को ध्वस्त करने वाली जिद तथा संघर्ष की मिसाल है। टंट्या भील के शौर्य की छबियां वर्ष 1857 के बाद उभरीं। जननायक टंट्या ने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ग्रामीण आदिवासी जनता के साथ शोषण और उनके मौलिक अधिकारों के साथ हो रहे अन्याय-अत्याचार की खिलाफत की। दिलचस्प पहलू यह है कि स्वयं प्रताड़ित अंग्रेजों की सत्ता ने जननायक टंट्या को “इण्डियन रॉबिनहुड’’ का खिताब दिया। मध्यप्रदेश के जननायक टंट्या भील को वर्ष 1889 में कुछ जयचंद की वजह से फाँसी दे दी गई।

टंट्या भील का जन्म 1840 के क़रीब मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था. टंट्या भील का असली नाम ‘टण्ड्रा भील’ था. वो एक ऐसे योद्धा थे जिसकी वीरता को देखते हुए अंग्रेज़ों ने उन्हें ‘इंडियन रॉबिन हुड’ नाम दिया था. देश की आजादी के जननायक और आदिवासियों के हीरो टंट्या भील की वीरता और अदम्य साहस से प्रभावित होकर तात्या टोपे ने उन्हें ‘गुरिल्ला युद्ध’ में पारंगत बनाया था

वो ‘भील जनजाति’ के एक ऐसे योद्धा थे, जो अंग्रेज़ों को लूटकर ग़रीबों की भूख मिटाने का काम करते थे. टंट्या ने ग़रीबों पर अंग्रेज़ों की शोषण नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी, जिसके चलते वो ग़रीब आदिवासियों के लिए मसीहा बनकर उभरे. आज भी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी घरों में टंट्या भील की पूजा की जाती है.

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